सूरह अज-जुखरूफ [43]
﴾ 1 ﴿ ह़ा मीम। ﴾ 2 ﴿ शपथ है प्रत्यक्ष (खुली) पुस्तक की। ﴾ 3 ﴿ इसे हमने बनाया है अरबी क़ुर्आन, ताकि वे इसे समझ सकें। ﴾ 4 ﴿ तथा वह मूल पुस्तक [1] में है, हमारे पास, बड़ा उच्च तथा ज्ञान से परिपूर्ण है। 1. मूल पुस्तक से अभिप्राय लौह़े मह़फ़ूज़ (सुरक्षित पुस्तक) है। जिस से सभी आकाशीय पुस्तकें अलग कर के अवतरित की गई हैं। सूरह वाक़िआ में इसी को “किताबे मक्नून” कहा गया है। सूरह बुरूज में इसे “लौह़े मह़फ़ूज़” कहा गया है। सूरह शुअरा में कहा गया है कि यह अगले लोगों की पुस्तकों में है। सूरह आला में कहा गया है कि यह विषय पहली पुस्तकों में भी अंकित है। सारांश यह है कि क़ुर्आन के इन्कार करने का कोई कारण नहीं। तथा क़ुर्आन का इन्कार सभी पहली पुस्तकों का इन्कार करने के बराबर है। ﴾ 5 ﴿ तो क्या हम फेर दें, इस शिक्षा को, तुमसे, इसलिए कि तुम उल्लंघनकारी लोग हो? ﴾ 6 ﴿ तथा हमने भेजे हैं बहुत-से नबी (गुज़री हुयी) जातियों में। ﴾ 7 ﴿ और नहीं आता रहा उनके पास कोई नबी, परन्तु वे उसके साथ उ...